ग्वालियर का किला इतिहास और घूमने की जानकारी

मध्यप्रदेश के ग्वालियर शहर में गोपांचल नामक पहाड़ी पर लगभग 3 वर्ग किलोमीटर में लाल बलुए पत्थर से बना ग्वालियर का किला भारतीय राजनैतिक के उतार चढाव का प्रत्यक्ष साक्षी रहा है ।

गोपगिरि पहाड़ी के सकरी जगह में बना यह किला किसी ज़माने में भारत के सबसे सौंदर्य किले में से एक हुआ करता था । इसी बजह से इस खूबसूरत किला को मोतियों का किला कहा जाता है ।

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ग्वालियर किला का इतिहास-gwalior fort history in hindi

ग्वालियर का किला राजाओ और हमलाबरो की बुलंदी और कामयाबी को छूते हुए बड़े ढंग से देखा है इस किले ने कई हिन्दू बंशो , तुर्को , अफगानो और मुगलो ,मराठो और अंग्रेजो के शाशन को देखा है जो शायद ही किसी और किले ने देखा हो ।

ग्वालियर किले की स्थापना के बाद लगभग 989 ईस्वी तक यहाँ पाल बंश के राजाओं ने शाशन किया उसके बाद यह प्रतिहार बंश के राजाओं का राज्य रहा ।

इतिहास कार बताते है की सं 1023 ईस्वी में यहाँ पर गजनी ने ग्वालियर के इस किले में आक्रमण किया था लेकिन उस समय पराजित होकर वापस लौट गया ।

सं 1196 ईस्वी में लम्बी घेरा बंदी के बाद कुतुब्बुदीन ऐबक ने Gwalior fort को जीत लिया था जिसके बाद यहाँ पर 1211 ईस्वी में एक बार फिर से युद्ध हुआ और इस बार कुतुब्बुद्दीन को हार का सामना करना पड़ा था ।

सं 1231 ईस्वी में शम्शी वंस के राजा इल्तुतमिस ने ग्वालियर के इस किले को अपने अधीनस्त कर लिया । तब ग्वालियर के इस किले में आया एक ऐसा ऐतिहासिक समय जब सं 1409 ईस्वी में महाराज देवब्रम ने ग्वालियर के इस किले में तोमर वंस की स्थापना की ।

राजा मानसिंघ तोमर इसी वंस के प्रसिद्द शाशक हुए । और 1486 से लेकर 1516 ईस्वी तक राजा मानसिंग ने इस किला में राज्य किया ।

कहते है 1804 से लेकर 1844 के बीच ये किला अंग्रेजो और सिंधिया राजबंशो के बदलते आधिपत्य के नियंत्रण में रहा हलाकि जनवरी 1844 में ये किला महाराज पुर किलदायी के बाद पूर्ण रूप से सिंधिया राजबंशो के कब्जे में हो गया ।

अंग्रेजो के हाथो झांसी छिन जाने के बाद रानी लक्ष्मी बायीं ग्वालियर आयी यहाँ आकर सिंधिया बंश के राजयो से पनाह मांगी लेकिन उन्होंने साफ तौर पर किसी तरह से मदत करने से मना कर दिया तब

1 जून 1858 को झाँसी की रानी लक्ष्मी बायीं ने मराठा विद्रोह से साथ मिलकर इसे अपने कब्जे में कर लिया था लक्ष्मी बायीं के कब्ज़ा करने के (15 दिन बाद) 16 जून 1858 को जनरल ह्यूरोज के नेतृत्व में अंग्रेजो के सैनिको ने ग्वालियर के किला में धाबा बोल दिया ।

कहते है रानी लक्ष्मी बायीं इस किले में खूब लड़ी लेकिन अंत में अंग्रेजो की गोली लगने की बजह से उनकी मृत्यु हो गयी । और ग्वालियर किला में अंग्रेजो ने कब्ज़ा कर लिया ।

18 वी शताब्दी के आखिरी दिनों में मराठा सिंधीयो ने सत्ता संभाली उनके साशन काल में ग्वालियर 60 हजार स्कायर किलोमीटर में फैला हुआ था ।

भारत की आजादी तक ग्वालियर का किला ब्रिटिश पोस्ट बना रहा लेकिन इसका निर्माण कब हुआ था इसकी कोई पुख्ता जानकारी नहीं है ये सिर्फ मृतकों की कहानियो पर निर्भर है ।

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कहते है की शुरुआत में 7 वी शताब्दी और 15 शताब्दी के बीच ग्वालियर दुर्ग में जैन धर्म के गुफा मंदिर बनाये गए थे पत्थर से बनी कई मूर्तियों में से एक है जैन धर्म के पहले तीर्थंकर आदिनाथ की 58 फिट ऊँची विशाल मूर्ती ।

  • ग्वालियर शहर से 22 किलोमीटर दूर सिंघानिया नामक गांव में रहने बाले स्थानीय सरदार सूर्य सेन द्वारा सं 700 ईस्वी में ग्वालियर के इस किले का निर्माण कराया गया था ।
  • ग्वालियर का किला प्राचीन नक्काशी का एक बेहतरीन नमूना है.
  • ग्वालियर किला का रिकार्डेड इतिहास करीब १३०० साल पुराना माना जाता है.
  • ग्वालियर किला को भारत की सबसे खूबसूरत ऐतिहासिक धरोहरों में गिनती होती है.
  • यह लगभग 2.5 किलोमीटर लम्बा और 1 किलोमीटर चौड़ा है.
  • किले के स्थापना के बाद लगभग 900 ईस्वी तक यहाँ के पाल वंश के राजयो ने राज्य किया इसके बाद यहाँ पर प्रतिहार वंस के राजयो का शाशन रहा ।

इतिहास में यह लड़ाई ग्वालियर की लड़ाई के नाम से प्रसिद्द है जहा ग्वालियर का किला अपने वीर सपूतो को शहीद होते हुए देखा है।

ग्वालियर का किला किसने और कब बनवाया-gwalior ka kila kisne banwaya

ग्वालियर शहर से 22 किलोमीटर दूर सिंघोनिया नामक गांव में रहने बाले स्थानीय सरदार सूर्य सेन द्वारा सं 700 ईस्वी में ग्वालियर के इस किले का निर्माण कराया था । ग्वालियर का किला कब बना था इसका कोई पुख्ता जानकारी नहीं है ये सिर्फ मृतकों की कल्पना और कहानियो पर निर्भर है ।

यदि आपको इतिहास के पन्नो को पलट कर देखने में रूचि है तो एक बार आपको ग्वालियर के इस भव्य किला को जरूर देखना चाहिए । इस किले की बनावट और कलाकारी आपको यकीनन पसंद आएगी और सोचने पर मजबूर कर देगी क आखिर उस ज़माने में इतनी सुन्दर भव्य ईमारत कैसे बनायीं गयी होगी ।

Gwalior Fort तक कैसे पहुंचे ?

Gwalior Fort – तक पहुंचने के लिए 2 रास्ते है – Urwai गेट और गुजारी महल इनमे से आपको मै recommend करूँगा urwai gate से जाने के लिए क्योकि गुजारी महल से किला तक पहुंचने के लिए आपको पैदल के दूरी तय करनी होगी । लेकिन उरवाई गेट से आप सीधे किले में प्रवेश कर जायेंगे ।

मीना कार्य वर्क से सजी हुयी ग्वालियर किला के बाहरी दीवारे हिन्दू वास्तुकला का बेहतरीन नमूना है विशाल प्रवेश द्वार के नीचे से पुराने शहर को जाने बाला यह रास्ता ग्वालियर दरवाजा कहलाता है जहाँ से कभी हांथी पर सवार होकर महाराजा मानसिंघ की सवारी गुजरा करती थी ।

किला में छोटी छोटी सीढ़ियों के गलियारों से होकर गुजरते हुए शैलानी किला के ऊपरी हिस्से तक पहुंचते है जहा से उन्हें पूरे ग्वालियर सिटी का एक शानदार दृश्य दिखाई पड़ता है जो आने बाले शैलानियों को ग्वालियर का किला अपनी तरफ आकर्षित करता है ।

ग्वालियर किला में घूमने की जगह- Complete Tour guide of gwalior fort in hindi

राजा मानसिंग के समय में निर्मित मानसिंघ पैलेस और मान मंदिर ग्वालियर के इस खूबसूरत किला का मुख्य आकर्षण है ।

लेकिन इसके अतिरिक्त ग्वालियर दुर्ग के अंदर और भी कई घूमने की जगह मौजूद है जहा साल भर पर्यटक भारत की इस ऐतिहासिक धरोहर की सुंदरता को निहारने के लिए यहाँ आते है ।

ग्वालियर का किला घूमने के लिए आपको अधिकतक 2 घंटे का समय लग सकता है । तो आईये जानते है ग्वालियर किला में घूमने की जगह

1.मानसिंग पैलेस ग्वालियर

ग्वालियर के किला अपने अंदर बहुत से राज छिपाये बैठा है यहाँ बने महलो में मान मंदिर पैलेस मशहूर है अपने टाइल वर्क और बेहतरीन नक्काशी के लिए साल 1486 में तोमर राजपूत राजा मानसिंघ के द्वारा इसका ग्वालियर दुर्ग में निर्माण करबाया गया था ।

राजा मानसिंघ के 9 रानिया थी जिनमे से 8 रानिया राजपूत थी जो इसी महल में रहती थी और 9 वी रानी गुर्जर थी जिसका नाम मृगनैनी उसकी सुंदरता के सामने कातिल हो गए थे राजा मानसिंघ और विवाह का पैगाम भेज दिया था ।

मृगनैनी से विवाह करने के बाद उनके लिए एक स्पेशल महल गुजारी महल का निर्माण करवाया था जो ग्वालियर किला के तलहटी में पड़ता है

ग्वालियर किला के दुर्ग में मान मंदिर पर्यटकों का मुख्य पर्यटन स्थल है जो हमें उस समय के जीवन शैली राजशाही रहन सहन को आइना दिखता है ।

मानसिंघ पैलेस का इतिहास :-

1516 ईस्वी में ग्वालियर किला को मुग़ल शाशक बाबर ने पूर्ण रूप से अपने कब्जे में ले लिया उसके बाद इस खूबसूरत ईमारत को जेल में तब्दील कर दिया ।

जब मुगलो को ग्वालियर सल्तनत में खतरा होता उसे इस खतरनाक तहखाने में कैद का दिया जाता फिर चाहे वो करीबी रिश्तेदार या सगे सम्बन्धी ही क्यों ना हो मुग़ल बादशाह किंसी को नहीं बक्शते थे ।

मानसिंघ पैलेस बाहर से देखने में जितना खूबसूरत है अंदर से उतना ही ज्यादा डरावनी भी है इसके अंदर प्रवेश करने के बाद भीतरी हिस्से में बना तहखाना (जेल ) जो रोंगटे खड़ा कर देने बाला है ।

ग्वालियर के इस खतरनाक काल कोठरी जेल से किसी कैदी को भाग जाना नामुमकिन था बिलकुल न के बराबर हुआ करता था ।

ग्वालियर के किला में गद्दी के लिए खतरा बनने बालो को बड़ी ही बेरहमी से हटा दिया जाता था मुगलो का एक खास तरीका था की ऐसे लोगो को जबरन अफीम खिलाना कुछ कैदी कई वर्ष नसे में रहने के बाबजूद भी कुछ नहीं कर पाते थे और कुछ मार दिए जाते ।

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2.मान मंदिर पैलेस

मानसिंघ पैलेस दरबाजे के दुसरे छोर में स्थित मानसिंघ मंदिर जिसका निर्माण राजा मानसिंघ तोमर के द्वारा करवाया गया था उस समय यह एक विशाल शिव मंदिर हुआ करता था लेकिन मुगलो के आने के बाद मंदिर को नस्ट कर दिया गया ।

3.गुजरी महल और म्युसियम

राजा मानसिंघ तोमर के शाशन में कई महलो का निर्माण किया गया उन्ही में से एक गुजरी महल जो ग्वालियर किला के तलपटी में बना हुआ है गुजारी महल के निर्माण की मुख्य बजह मानसिंघ की 9 वी रानी मृगनैनी जिससे ग्वालियर के तोमर बांस राजा मानसिंघ ने Love marrige किया था । उन्ही के लिए स्पेशल रूप से गुजारी महल को बनबाया गया ।

लेकिन अब मध्यप्रदेश टूरिज्म ने इस महल को म्युसियम में तब्दील कर दिया जहा पर्यटकों को ग्वालियर किला के बारे में सम्पूर्ण इतिहास को जानने और देखने को मिलता है ।

4.जौहर कुंड ग्वालियर

ग्वालियर के इस किला में तोमर बंश के शाशन में जब मुगलो ने आक्रमण किया तो राजपूतो ने केसरिया रंग के पागा पहन कर युद्ध के लिए किला से बाहर निकले और दुशमनो पर टूट पड़े । लेकिन राजपूतो को युद्ध में हार का सामना करना पड़ा ।

किला के अंदर जब रानियों को यह सूचना मिली की राजा युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए तब उन्होंने मुगलो से बचने के लिए सभी रानिया और दसिया समेत कुंड में आग की ज्वाला जलाई और उस जलती हुयी आग मे आत्म समर्पण कर लिया ।

तब ग्वालियर के यह किला एक बार फिर अपने वीर सपूतो को खोया और हिन्दू बंश के औरतो ने जौहर कर आने बाली पीढ़ी को उस समय के रीति रिवाज और हिन्दू होने से रूबरू कराया की जीते जी अपने पति के सिबाय किसी पराये मर्द के साथ नहीं रह सकती ।

2.विक्रम महल

राजा मानसिंघ के बेट विक्रमादित्य के द्वारा बनवाया गया यह किला कफी खूबसूरत है और इस महल के भीतरी हिस्से में एक शिव मंदिर भी मौजूद है । जहा पर्यटक दर्शन के लिए जाते है ।

6.केशर कुंड ग्वालियर फोर्ट

यह कुंड ग्वालियर की महारानियो के स्नान के लिए बनवाया गया था जिसमे साफ़ और सुन्दर स्वक्छ पानी में रानियों के नहाने के लिए केशर मिलाया जाता था इसी बजह से इसे केशर कुंड कहा जाता जाता है ।

6.सास बहु मंदिर ग्वालियर

इस मंदिर का नाम सुंनने में थोड़ा अटपटा सा लगता है ना लेकिन ठीक इसके नाम की तरह इसका इतिहास भी काफी रोचक है आज से लगभग 1 हजार बर्ष पूर्व 1093 ईस्वी में राजा महिपाल सिंह के द्वारा इस मंदिर का स्थापना करवाया गया था ।

राजा महिपाल जी की माँ भगवान वृषनु जी की उपासक हुआ करती थी और इन्ही के पूजा अर्चना के लिए इस मंदिर का 1093 ईस्वी में निर्माण कराया गया था ।

और राजा महिपाल की पत्नी भगवान शिव जी की उपासक हुआ करती थी और इनके आराधना हेतु एक और मंदिर का निर्माण कराया गया था जो इस मंदिर के ठीक सामने है ।

सास बहु मंदिर का नाम पड़ने का मुख्य बजह भगवान वृषनु के सम्पूर्ण अवतार में सहस्त्र भुजाओं के वर्णन के कारण ग्वालियर के इस मंदिर को सहस्त्र बहु मंदिर कहा गया पर कालांतर में शाब्दिक अर्थ सास बहू काफी प्रचलन में हो गया जिसकी बजह से इस मंदिर का नाम सास बहु पड़ा ।

7.तेली का मंदिर ग्वालियर

अपने बेहतरीन सुन्दर architecture और अलग वास्तुकला को सम्मोहित किये हुए ऊँचे शिखर बाला तेली का मंदिर काफी प्रसिद्द है । कहते है इसकी स्थापना 8 और 9 वी शताब्दी के बीच करवाई गयी होगी ।

उस समय यह मंदिर हिन्दू धार्मिक स्थल रहा होगा हिन्दू और बौद्ध शैली में बना ये मंदिर दक्षिण भारत की द्रविण शैली में बनाया गया है जिसमे तेली के मंदिर के सिखर की ऊंचाई लगभग 100 फिट है ।

नक्काशी कलाकारी से बनाया गया यह मंदिर ग्वालियर आने बाले पर्यटकों को काफी आकर्षित करता है ग्वालियर किला की यात्रा के दौरान तेली के इस मंदिर को विजिट करना न भूले ।

8.शून्य का मंदिर-Temple of zero gwalior

ग्वालियर के किला के मुख्य द्वार की चढ़ाई पर पड़ता है टेम्पल ऑफ़ जीरो 9 वी शताब्दी में बनाया गए इस नक्काशी दार मंदिर में सबसे पहले शून्य की डिजाइन देखने को मिलती है ।

नागबंस के इस मंदिर पर सबसे पहले पत्थर पर numeric जीरो के लिखबाट का प्रमाण मिलता है और ये शून्य बर्तमान के जीरो का ही स्वरुप है ।

आज ग्वालियर का किला में इतिहास और यादगार बाते छिपी हुयी है इन्हे जानने के लिए ग्वालियर की यात्रा करना बेहद जरूरी है ।

8.कर्ण महल ग्वालियर

ग्वालियर दुर्ग के भीतर एक और शानदार महल जो तोमर बंश के दुसरे शाशक कीर्ति सिंह के द्वारा 1480 से 1486 के आस पास कराया गया था ।

ग्वालियर फोर्ट में स्थित सभी महल और किले वर्तमान के प्राचीनतम इतिहास का एक बेहतरीन नक्काशी का पहलु है जो आज के आधुनिक समय में हमें यह आइना दिखते है की हम मानवो ने विज्ञानं के युग में कितना कुछ पीछे छोड़ आये है ।

9.जहांगीर और शाहजहां पैलेस ग्वालियर

ग्वालियर दुर्ग के भीतर स्थित यह महल मुगलो का one of the best architecture का एक नमूना है यहाँ आने के बाद पर्यटकों का वक्त ठहर सा जाता है । इसका निर्माण शाहजहां के द्वारा करवाया गया था।

10.जय विलास पैलेस म्युसियम ग्वालियर

ग्वालियर में वैसे बहुत सी जगह है घूमने के लिए लेकिन ग्वालियर में एक ऐसी बेहतरीन जगह है जहाँ घूमने के लिए बिलकुल भी मिस न करे नहीं तो आपकी ग्वालियर मे घूमने की यात्रा अधूरी हो सकती है ।

1874 में जय जी राव सिंधिया के द्वारा खूबसूरत महल का निर्माण कराया था उसके बाद 1964 में जीवाजी राव ने इसके 8 पार्ट को म्युसियम में बदल दिया।

तब से यह जगह पर्यटन स्थल के रूप में ग्वालियर में काफी प्रसिद्द हो गयी मतलब ग्वालियर आये और जय विलास पैलेस न घूमे ऐसा हो ही नहीं सकता ।

यहाँ पर आपको देखने के लिए मिलेगा सिंधिया फैमिली के पूर्वजो के रॉयल अंदाज में रहन सहन और उनकी जीवन शैली जो आज के आधुनिक समय से भी कही आगे है ।

11.तानसेन का मकबरा

हिंदुस्तानी संगीत साहित्य के इतिहास में तानसेन ऐसे महान गायक थे जिन्हे अपनी सभा में शामिल करने के लिए 2 राज्यों के बीच युद्ध भी छिड़ गया था ।

यु तो ग्वालियर ऐतिहासिक धरोहरो का शहर है यहाँ थोड़ी -थोड़ी दूर पर कई ऐतिहासिक इमारते मौजूद है इनमे से सबसे प्रसिद्द ग्वालियर का किला और जय विलास पैलेस है पर इन सभी के बीचो बीच शहर के भीड़ भाड़ से दूर है तानसेन का मकबरा ।

स्वामी हरिदास जी को अपना पहला गुरु मानते हुए तानसेन जी ने मात्र 6 बर्ष की उम्र में गायकी की शुरुआत कर दी थी उनके शुरुआत दिनों में कलाप्रेमी राजा मानसिंघ का शाशन हुआ करता था । जिन्होंने पूरे हिंदुस्तान में संगीत का परचम लहराया ।

उनके प्रोत्साहन से ग्वालियर गायकी का प्रमुख केंद्र हुआ करता था जहा बैजू बाबरा , कर्ण, और महमूद जैसे संगीत कलाकार गायक मौजूद थे ।

सोलहवीं शताब्दी में बनी इस ईमारत में आज भी तानसेन की संगीतो की गूँज सुनने के लिए शैलानी ग्वलियर आया करते है जहाँ रगरानियो , कलाकारी और नक्काशी दार बनावट के बीच भारतीय पुरुष तानसेन की यादें छुपी हुयी है ।

Gwalior Fort खुलने का समय क्या है ?

gwalior ka kila – सप्ताह से 7 दिन open रहता है जिसका खुलने का समय सुबह 9 बजे से शाम 5:30 बजे तक ही रहता तो जब भी आप इस ऐतिहासिक धरोहर को घूमने के लिए जाये तो समय का विशेष रूप से ध्यान अवश्य दे ।

gwalior fort का टिकट कितने का मिलता है?

ग्वालियर किला का टिकट प्राइस –

  • ग्वालियर किला का प्रवेश शुल्क 0 से 15 साल के बच्चो का टिकट बिलकुल फ्री होता है ।
  • जबकि 15 बर्ष से अधिक आयु के लोगो के लिए 25 रुए का टिकट मिलता है
  • जो ग्वालियर दुर्ग के भीतर 3 प्रमुख स्मारकों के लिए मान्य है जिनमे से मानसिंघ मंदिर , तेली का मंदिर और सास बहू का मंदिर।
  • फोटोग्राफी के लिए यदि आपके पास कैमरा है तो उसका अलग से 25 रूपए का चार्ज देना होगा ।

इसकी सबसे खास बात की टिकट आपको ऑनलाइन ही खरीदना होता है आप चाहे तो इस लिंक के द्वारा फोर्ट का टिकट खरीद सकते है

ग्वालियर फोर्ट टिकट portal

ग्वालियर का किला भूल भुलैया

मान मंदिर पैलेस में बना भूलभुलैया कहने को तो ये एक महल है लेकिन इसके अंदर जाने पर पर पता चलता है की जाने के लिए तो कई सारे गलियारे मिल जायेंगे लेकिन वापस आने के लिए केबल एक ही रास्ता है ।

ग्वालियर कैसे पहुंचे ?

ग्वालियर की यात्रा करने के लिए यह शहर भारत के लगभग सभी बड़े शहरो दिल्ली , मुंबई , चेन्नई , कोलकाता , और हैदराबाद जैसे शहरो से बस , ट्रैन , और हवाई जहाज से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है । आप अपने सुबिधाओं के अनुसार यातायात का बिकल्प चुन सकते है । दिल्ली से मात्रा 360 किलोमीटर दूर नेशनल हाईवे 8 पर आगरा रोड में पड़ता है ।

Faq – ग्वालियर फोर्ट के बारे में पूछे जाने बाले प्रश्न

ग्वालियर किला कब बना था?

ग्वालियर शहर से 22 किलोमीटर दूर सिंघोनिया नामक गांव में रहने बाले स्थानीय सरदार सूर्य सेन द्वारा सं 700 ईस्वी में ग्वालियर के इस किले का निर्माण कराया था । ग्वालियर का किला कब बना था इसका कोई पुख्ता जानकारी नहीं है ये सिर्फ मृतकों की कल्पना और कहानियो पर निर्भर है ।

आधुनिक युग में हम अपने पूर्वजो के ऐतिहासिक और कलात्मक धरोहर को भूल न जाये इसीलिए इनकी व्यवस्था , सुरक्षा और सहयोग की हमारी एक नैतिक जिम्मेदारी बनती है अपने देश में ग्वालियर का किला देखने के लिए सभी के साथ इस जानकारी को शेयर करे ।

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