गोवर्धन परिक्रमा कब और कैसे की जाती है ? जानिए संपूर्ण जानकारी

उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में स्थित गोवर्धन पर्वत एक पहाड़ी है जिसे भगवान श्री कृष्ण जी ने 7 वर्ष की आयु में 7 दिनों तक अपनी कनिष्ठा उंगली पर उठाए थे इसे कुछ लोग गिरिराज के नाम से जानते हैं तो वहीं कुछ लोग गोवर्धन कहते हैं यूं कहें तो दोनों एक ही है। इसी गिरिराज पर्वत की परिक्रमा लगाने के लिए प्रतिदिन हजारों की संख्या में लोग इस स्थान पर पहुंचते हैं।

संपूर्ण गोवर्धन की परिक्रमा ( 7 कोस ) 21 किलोमीटर की होती है जो कि मानसी गंगा से प्रारंभ की जाती है इसके मार्ग में पड़ने वाले कई महत्वपूर्ण दर्शनीय स्थलों को शामिल किया गया है इनमें दान घाटी , मानसी गंगा , अभय चक्रेस्वर मंदिर , सुरभी कुंड , कुशुम सरोवर, पूछरी का लोटा , जतीपुरा , राधा कुंड , गोविन्द कुंड , संकर्षण कुंड, और गौरीकुंड इन सभी स्थानों पर राधा कृष्ण के बड़ी सुंदर लीलाएं हुई है।

श्रद्धालुओं द्वारा श्रद्धा भाव का यह आलम साल के 365 दिन चलता रहता है चाहे झुलसती धुप हो , कपकपाती ठण्ड या फिर चाहे घनघोर बरसात हो परिक्रामर्थी किसी बाधा से नहीं घबराते भगवान के दिव्य अलौकिक शक्ति से पथरीली राह भी उन्हें पुष्पों सी कोमल लगने लगती है।

गोवर्धन परिक्रमा कब की जाती है ?

हर महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी से पूर्णिमा रात तक परिक्रमार्थियों की संख्या लाखो में होती है , गुरु पूर्णिमा और दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा पर यहां आने वाले श्रद्धालु का आंकड़ा की गिनती नहीं की जा सकती इस दौरान परिक्रमा करने से सबसे ज्यादा लाभ मिलता है।

गोवर्धन की परिक्रमा का महत्व क्या है ?

हमारे शास्त्रों में कहा गया है गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करने से जीवन का परम लक्ष्य, परम शक्ति और भगवान की दुर्लभ भक्ति अत्यंत ही सहायता से हासिल हो जाते हैं इसीलिए हर व्यक्ति को अपने जीवन काल में गिरिराज पर्वत की परिक्रमा एक बार अवश्य लगानी चाहिए जिससे राधा और कृष्ण की प्रेम भक्ति आपके जीवन में सदैव बनी रहेगी।

इसके साथ साथ दीपावली के शुभ अवसर पर गोवर्धन पूजा यानी गाय की पूजा जरूर करवानी चाहिए क्योंकि यह हिंदू धर्म में बहुत ही महत्वपूर्ण है।

इस प्रकार गोवर्धन की महिमा ऐसी है की खुली आँखों से जितने देखेंगे उतना ही कम पड़ जाएगा इसकी महिमा अनंत है क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण जी अपनी मुरली की धुन केवल वृंदावन में ही बजाते हैं कहीं और बजा ही नहीं सकते सकते ।

गोवर्धन परिक्रमा करने के नियम

परिक्रमा आरम्भ करने से पहले गोवर्धन परिक्रमा के नियम को जानना अति आवश्यक है-

  • परिक्रमा शुरू करने से पहले परिक्रमा मार्ग के किसी भी एक मंदिर में पूजा करके ही आरम्भ करें और इसे जब खत्म करें तो वापस उसी मंदिर में लौट के आ जाएं .
  • परिक्रमा जहां से अपनी मर्जी वहां से कर सकते हैं ज्यादातर लोग तो परिक्रमा का शुभारंभ दानघाटी से करते हैं.
  • गोवर्धन पर्वत में ना चढ़े इससे भगवान के मान का खंडन होता है।
  • गोवर्धन के किसी भी कुंड में केवल पैर ना धुले बल्कि पूर्ण स्नान करें ऐसा करने से पुण्य फल मिलता है .
  • परिक्रमा करते हुए मार्ग में सांसारिक वातावरण से दूर रहें किसी भी तरह की बातें ना करें बल्कि पूरी श्रद्धा भाव से राधे राधे बरसाने वाली राधे का जाप करते रहे ।
  • गोवर्धन पर्वत  की परिक्रमा करने के बाद कुछ लोग इसे खड़ी हुयी गाय का स्वरुप बताते है तो कुछ बैठी हुयी गाय बताते है आप ध्यान दे चाहे जिस भी स्वरुप में हो आपको पता होना चाहिए कि गोवर्धन यानी गाय की पूजा कर रहे हैं तो आप अपनी श्रद्धा भाव से गाय को मानिये और उसकी सेवा कीजिए।

गोवर्धन पर्वत का रहस्य

पुराणों के अनुसार एक बार इंद्रा देवता क्रोध में आकर ब्रज बसियो को इतना तंग कर दिए की पूरे ब्रज मंडल में जल ही जल का भराव हो गया जिससे उनका जीवन संकट में आ गया तब श्री कृष्ण जी ने इन्द्र देवता का मान मर्दन करने के लिए अपने हाँथ की सबसे छोटी ऊँगली में पूरे पर्वत को उठा लिए और सभी ब्रज बसियो को गोवर्धन पर्वत के नीचे शरण दिया.

दूसरी कथा कहती है की द्वापर के जब भगवान व्रिष्णु कृष्ण रूप में जन्म लेने से पहले लक्ष्मी जी से कहते है देवी अब पृथ्वी में अवतार लेने का समय आ गया है तब माता लक्ष्मी जी भगवान से कहती है की प्रभु जिस जगह गिरिराज यानि गोवर्धन , यमुना और वृन्दावन नहीं होंगे तो हमें वहां मन विचलित सा लगेगा तब भगवान ने पृथ्वी लोक में गोवर्धन पर्वत , यमुना नदी और वृन्दावन को प्रकट किया था ।

गोवर्धन पूजा मंत्र संस्कृति में

गोवर्धन धराधार गोकुल त्राणकारक।
विष्णुबाहु कृतोच्छ्राय गवां कोटिप्रभो भव।।

हे कृष्ण द्वारकावासिन् क्वासि यादवनन्दन। 
आपद्भिः परिभूतां मां त्रायस्वाशु जनार्दन।।

गोवर्धन परिक्रमा मार्ग के दार्शनिक स्थल

गोवर्धन की परिक्रमा मार्ग के पग -पग में भगवान श्री कृष्ण के और राधा मैया के चरणों के निशान और कई ऐसे रहस्मयी चिन्ह मौजूद हैं जिनके दर्शन मात्र से जीवन धन्य हो जाता है आइए विस्तार से जानते हैं-

1. दानघाटी

दानघाटी मंदिर के मुख्य द्वार पर भगवान कृष्ण अपनी कनिष्ट ऊँगली में पर्वत को उठाये हुए है ऐसा दृश्य देखने को मिलता है 7 दिन 7 बर्ष की आयु और 7 रात तक भगवान श्री कृष्ण ने अपनी कनिष्ठ ऊँगली में गोवर्धन पर्वत को उठाया था ।

दानघाटी वही जगह जहां में श्यामसुंदर अपने बाल शाखाओं के साथ गोपियों से दूध दही का दान लिया करते थे दान केवल इसी भाव से लिया जाता था की अगर कंश के यहाँ सारा दूध दही गोपियाँ ले जाएँगी तो उसके सैनिक थोड़ा ज्यादा बलशाली हो जायेंगे और ब्रज के लोग कमजोर रहेंगे तो जब युद्ध का समय आएगा तो ब्रज मंडल के सैनिक कमजोर पड़ जायेंगे ।

2. मानसी गंगा गोवर्धन

गोवर्धन पर्वत से 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित मानसी गंगा के बारे में ऐसी मान्यता है की एक बार कंश ने बत्सासुर नाम के दैत्य को भगवान कृष्ण का बद्ध करने के लिए भेजा था तब वो असुर बछड़े के रूप में कृष्ण के गया में शामिल हो गया और कन्हैया ने उसे पहचान का मार डाले थे ।

तब राधा रानी ने उनसे कहा की आपने गौ हत्या की है आपको पापो से मुक्ति के लिए तीर्थ यात्रा करनी चाहिए , तब कृष्ण ने अपने बंसी से एक कुंड का निर्माण किया तथा और सभी तीर्थो से प्राथना करके इस कुंड में शामिल होने का न्योता दिया।

यहां सभी तीर्थ स्थलों का जल मौजूद है ज्यादातर श्रद्धालु गोवर्धन परिक्रमा लगाते हुए कुंड में नौका विहार का लुफ्त उठाते हैं।

3. अभय चक्रेश्वर मंदिर

परिक्रमा मार्ग में पड़ने इस मंदिर में चक्र के आकार मैं पांच शिवलिंग है जिनके बारे में कहा जाता है जब भगवान श्री कृष्ण गोवर्धन पर्वत को अपने उंगली में उठा कर रखे थे तब उनके पैर का वजन इतना भारी था की पृथ्वी में धसने लगी जिसे गड्ढा हो गया था जिसकी वजह से वहां भारी मात्रा में पानी इकट्ठा हो गया तब शिव जी पानी को बाहर हटाने के लिए चक्र के रूप में प्रकट हुए ।

4. कुशम सरोवर

यही वो जगह जहां राधा और कृष्णा छुप-छुपकर मिलते थे उस समय पर यहाँ फूलो का बगीचा था और राधा जी पुष्प तोड़ने के लिए बरसाना से यहाँ आया करती थी और उसी बहाने श्री कृष्ण से मिलन करती ।

इस सरोवर के चारो तरफ बड़ी सुन्दर छत्रिया मौजूद है जो आज से लगभग 350 बर्ष पुरानी है इनका निर्माण राजा ज्वार सिंह के द्वारा 1675 में करवाया गया था फिर बाद में इन्हे जीर्णोद्धार किया मध्यप्रदेश ओरछा के राजा वीरसिंघ जी ने।

5. सुरभी कुंड

परिक्रमा मार्ग में एक खूबसूरत कुंडेश्वर है जो सुरभी कुंड के नाम से जाना जाता है यह वह स्थान है जहाँ दिव्य गाय सुरभि इंद्र को अभिषेक के लिए दूध देने के लिए प्रकट हुयी थी ।

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6. राधा कुंड

इस कुंड का निर्माण राधा रानी  ने अपने कंगन से किया था यह वह स्थान है जो समस्त ब्रह्मांड और सम्पूर्ण सृष्टि में सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि यही वह स्थान है जो सदा श्री कृष्ण के अमृतमयी प्रेम को लालायित रहता है ।

कुंड
राधा कुंड photo

माना जाता है जो व्यक्ति राधा अष्टमी के दिन इस कुंड में स्नान करता है उसे राधा रानी के भक्ति प्राप्त होती है ।

इसी कुंड के पास में स्थित श्याम कुंड के दर्शन कर सकते है ।

राधा कुंड और श्याम कुंड की अपनी अपनी अलग बिशेषता है श्याम कुंड को दूर से देखने पर इसका पानी सावरे रंग जबकि राधा कुंड का सफ़ेद स्वक्छ जल दिखाई देता है.

7. जतीपुरा (गिरिराज इंद्रा मान भंग पूजा मुखारविंद)

गिरिराज परिक्रमा मार्ग में स्थित जतीपुरा गांव में एक मंदिर है जहां भगवान श्री कृष्ण कामुक होने का आभास कराता है।

यहां पहुंचकर श्रद्धालु जो भी प्रसाद अर्पण करना होता है कर सकता है परिक्रमा के दौरान इस मंदिर के प्रसाद चढ़ाने का काफी ज्यादा महत्त्व बताया गया है

इस जगह के बारे में कहा जाता है की भगवान गिरिराज जी के मुखारविन्दु में श्री कृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम के मुख के दर्शन होते है इसीलिए यहाँ पर छप्पन भोज लगाया जाता है ।

8. पूंछरी का लोटा

परिक्रमा लगाने वाले भक्तों को पूंछरी का लोटा मंदिर में अवश्य जाना चाहिए यहां आने से इस बात की पुष्टि हो जाती है कि आप परिक्रमा लगा रहे हैं

यह बड़ी परिक्रमा में बहार के रास्ते में पड़ता है इस मंदिर की ऐसी मान्यता है की जब भगवान कृष्ण ब्रज को छोड़ कर द्वारिका जा रहे थे तब सभी ब्रजबासी उन्हें पहुंचने जा रहे थे उन्ही में एक उनका बाल सखा पूंछरी का लोटा जो काफी भावुक हो गए थे ।

तब भगवान ने उन्हें वचन दिया की मै 2 दिन बाद लौट कर आ जाऊंगा तभी से उनका ये सखा कृष्ण के लौटने के इंतज़ार में यहाँ विराजमान हो गए ।

इसके बारे में एक और भी मान्यता है की जब कृष्ण अपनी गायो को चराने यहाँ आया करते थे तो हनुमान जी बानर स्वरुप में उनके साथ खेला करते थे और कृष्ण ,हनुमान और उनकी गाये आपस में क्रीड़ाये करती थी तो उनका आपस में रिश्ता और भी अच्छा होता चला गया तो भगवान श्री कृष्ण जी ने उनको एक बार कहा की कलयुग में जो भक्त गोवर्धन परिक्रमा करेगा उसके तुम शाक्षी रहोगे और तुम गोवर्धन में हमेशा करना

9. राधा कृष्ण चरण मंदिर

परिक्रमा मार्ग के रास्ते में पड़ने बाले इस चरण मंदिर में राधा रानी और श्री कृष्ण के चरणों के निशान के दर्शन मिलते है । जहाँ आप रुक कर पूजा अर्चना कर सकते है ।

10. गोविन्द कुंड

यह वही जगह जहां जहाँ सोम भगवान इंद्र ने 7 गंगा 7 समुद्र का जल लेकर कृष्ण जी का जलाभिषेक किए थे ।

11. इंद्र कुंड-

यह वो झील है जहां पर इंद्र देवता ने खड़े होकर भगवान श्री कृष्ण की प्रार्थना की और उनका अभिषेक किया ।

कहते है ब्रज का जन्म और ब्रज का बॉस इंसान के पिछले जन्म के अच्छे कर्मो पर ही मिलता है बहुत सौभग्य शैली है है वो लोग जिनका जन्म ब्रज में हुआ है ।

FAQ- गोवर्धन के बारे में पूछे जाने बाले प्रश्न ?

Q.1- गोवर्धन परिक्रमा कितने किलोमीटर की है?

 7 यानी 21 किलोमीटर के गोवर्धन परिक्रमा होती है.

Q.2- गोवर्धन परिक्रमा कब की जाती है?

वैसे तो गोवर्धन की परिक्रमा के लिए साल भर श्रद्धालु आते है हर महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी से लेकर पूर्णिमा रात तक गोवर्धन पूजा के लिए यह समय विशेष माना जाता है और गुरु पूर्णिमा और गोवर्धन पूजा पर यहां आने वाले श्रद्धालु का आंकड़ा लाखो करोडो में पहुंच जाता है ।

Q.3 गोवर्धन पर्वत की ऊंचाई कितनी है? ?

 गोवर्धन पर्वत की ऊंचाई लगभग 5 हजार साल पहले 30 हजार मीटर हुआ करता लेकिन अब शायद मात्र 30 मीटर रह गया है ऋषि के श्राप के कारण पर्वत रोज कम होता जा रहा है

अंतिम लाइन –

अगर आप अभी तक गोवर्धन की परिक्रमा अथवा गिरिराज परिक्रमा करने नहीं आये तो एक बार जरूर आईयेगा और भगवान श्री कृष्ण और राधा की लीला स्थली ब्रज भूमि की खूबसूरती को अपनी आँखों से देखिएगा ।

अगर आपको यह लेख पसंद आया हो तो अपने दोस्तों और परिवार के साथ अवश्य शेयर करियेगा और गोवर्धन वृन्दावन या ब्रज मंडल से सम्बंधित कोई प्रश्न हो तो हमें कमेंट सेक्शन में पूछ सकते है ।

2 thoughts on “गोवर्धन परिक्रमा कब और कैसे की जाती है ? जानिए संपूर्ण जानकारी”

  1. Govardhan Maharaj ki jankari e dekh kar man main adbhut Shanti ka anubhava hua . Bhagwan Krishna mujhe Jaise nikist jeev per jaane kab kripa karenge.
    Main jivan mein sirf do bar hi Govardhan ki parikrama ki hai Lekin abhi tak man prapt nahin hua. Jay shree radhe krishna.

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  2. Adbhut romanchak sunkar hi jisko man itna prafhullot ho utha hai waha k darshan hone pr to hm dhanya ho jayenge jai sri radha krishna radhe radhe barsane wali radhe

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